Bihar Election 2025: पहले चरण में रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग — 8% बढ़े मतदान से किसकी बढ़ी टेंशन?
Bihar Election 2025 के पहले चरण में इस बार मतदाताओं ने इतिहास रच दिया है। गुरुवार को हुई वोटिंग में राज्यभर के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और मतदान का प्रतिशत अब तक के सभी चुनावों का रिकॉर्ड तोड़ गया। चुनाव आयोग के अनुसार, पहले चरण की 121 सीटों पर 64.69 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया है, जो 2020 के चुनाव से करीब 8.5 प्रतिशत अधिक है। यह अब तक बिहार विधानसभा चुनाव के इतिहास में सबसे ज्यादा मतदान है।
इतने अधिक वोटिंग प्रतिशत के साथ अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या इस बार भी वही पैटर्न दोहराया जाएगा, जब-जब बिहार में 5% से ज्यादा वोटिंग बढ़ी, सत्ता बदल गई।
Bihar Sees Highest Voter Turnout Ever - (बिहार में अब तक की सबसे बड़ी वोटिंग)
पहले चरण में बिहार के 18 जिलों की 121 विधानसभा सीटों पर कुल 1314 उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में बंद हो गई।
सुबह से ही मतदाताओं में उत्साह देखने को मिला, लोग मतदान केंद्रों पर लंबी कतारों में खड़े नजर आए।
चुनाव आयोग के मुताबिक, इस बार मतदान का औसत प्रतिशत 64.69% रहा, जबकि 2020 में यही प्रतिशत 56% था।
सुबह से ही मतदाताओं में उत्साह देखने को मिला, लोग मतदान केंद्रों पर लंबी कतारों में खड़े नजर आए।
चुनाव आयोग के मुताबिक, इस बार मतदान का औसत प्रतिशत 64.69% रहा, जबकि 2020 में यही प्रतिशत 56% था।
इतिहास पर नजर डालें तो बिहार में अब तक इतनी बड़ी वोटिंग पहले कभी नहीं हुई।
- 2000 के विधानसभा चुनाव में 62.57% वोटिंग हुई थी।
- 1998 के लोकसभा चुनाव में 64.60% वोटिंग हुई थी।
इस बार के विधानसभा चुनाव ने इन दोनों रिकॉर्ड्स को पीछे छोड़ दिया है।
Which Districts had the highest Voter turnout? - (किन जिलों में रहा सबसे ज्यादा मतदान?)
पहले चरण के मतदान में मिथिलांचल, कोसी, मुंगेर डिवीजन और भोजपुर बेल्ट में लोगों ने जबरदस्त जोश दिखाया।
- मुजफ्फरपुर: 70.96%
- समस्तीपुर: 70.63%
- वैशाली: 67.37%
- मधेपुरा: 67.21%
- सहरसा: 66.84%
- खगड़िया: 66.36%
- लखीसराय: 65.05%
- मुंगेर: 60.40%
- सीवान: 60.31%
- नालंदा: 58.91%
- पटना: 57.93%
इस प्रकार, कुल औसत 64.69% मतदान दर्ज किया गया — जो न केवल पिछले विधानसभा चुनाव बल्कि बिहार के समूचे चुनावी इतिहास में नया कीर्तिमान है।
Why did Voting Increase Public Anger or Desire for change? - (वोटिंग क्यों बढ़ी - जनता की नाराज़गी या बदलाव की चाह?)
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि वोटिंग प्रतिशत में इजाफा कई कारणों से हो सकता है।
- एंटी-इंकम्बेंसी फैक्टर: आमतौर पर माना जाता है कि जब जनता सरकार से नाराज़ होती है, तो मतदान प्रतिशत बढ़ जाता है। लोग बदलाव की इच्छा से बड़ी संख्या में वोट डालते हैं।
- प्रो-इंकम्बेंसी फैक्टर: कुछ मामलों में अधिक मतदान का मतलब यह भी होता है कि लोग सरकार से संतुष्ट हैं और उसे दोबारा सत्ता में लाना चाहते हैं।
- SIR (Special Revision) के बाद नए वोटर: इस बार बड़ी संख्या में नए वोटर जोड़े गए हैं और फर्जी वोट हटाए गए हैं, जिससे वास्तविक मतदाताओं की भागीदारी बढ़ी है।
फिर भी, बिहार के पिछले आंकड़े बताते हैं कि जब-जब वोटिंग में 5% से अधिक इजाफा हुआ है, सरकार बदली है।
Why did the Power change in Bihar when Voting Increased? - (बिहार में वोटिंग बढ़ने पर सत्ता क्यों बदली?)
बिहार की राजनीतिक परंपरा में एक दिलचस्प पैटर्न है –
जब भी वोटिंग 5% से ज्यादा बढ़ी, सत्ता पलट गई।
जब भी वोटिंग 5% से ज्यादा बढ़ी, सत्ता पलट गई।
साल 1967:
- 1962 में 44.5% मतदान हुआ था, जबकि 1967 में यह बढ़कर 51.5% हो गया। यानी करीब 7% का उछाल। परिणाम - कांग्रेस की सत्ता गई, और पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।
साल 1980:
- 1977 में 50.5% मतदान था, जो 1980 में बढ़कर 57.3% हो गया। परिणाम - जनता पार्टी सत्ता से बाहर हुई और कांग्रेस ने वापसी की।
साल 1990:
- 1985 में 56.3% मतदान हुआ था, जो 1990 में बढ़कर 62% पहुंच गया। परिणाम - कांग्रेस की विदाई, जनता दल की एंट्री और लालू प्रसाद यादव का उदय।
इन तीनों उदाहरणों ने एक परंपरा कायम की – “बढ़ी वोटिंग का मतलब सत्ता परिवर्तन।”
Will the Power Change this time too? - (क्या इस बार भी सत्ता बदलेगी?)
पहले चरण में 8.5% बढ़ी वोटिंग ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है।
2020 के पहले फेज में 56% वोट पड़े थे, इस बार 64.69% वोटिंग हुई है।
इतना बड़ा इजाफा बिहार की राजनीति में दुर्लभ है।
2020 के पहले फेज में 56% वोट पड़े थे, इस बार 64.69% वोटिंग हुई है।
इतना बड़ा इजाफा बिहार की राजनीति में दुर्लभ है।
राजनीतिक पंडितों का कहना है कि अगर यह ट्रेंड दूसरे चरण में भी जारी रहा, तो बिहार में सत्ता परिवर्तन की संभावना बढ़ जाएगी।
हालांकि कुछ लोग यह भी मानते हैं कि यह महागठबंधन के पक्ष में नहीं, बल्कि एनडीए के लिए “क्लोज फाइट” का संकेत हो सकता है।
The Direction of Power will be decided by the results of the first phase - (पहले चरण के नतीजों से तय होगी सत्ता की दिशा)
पहले चरण की 121 सीटें बिहार की राजनीति का सबसे अहम इलाका मानी जाती हैं।
यहां महागठबंधन और एनडीए के बीच सीधा मुकाबला है।
2020 में इन 121 सीटों में से –
यहां महागठबंधन और एनडीए के बीच सीधा मुकाबला है।
2020 में इन 121 सीटों में से –
- महागठबंधन ने 61 सीटें जीती थीं।
- एनडीए ने 59 सीटें जीती थीं।
- आरजेडी ने अकेले 42 सीटें जीती थीं।
- बीजेपी को 32 सीटें मिली थीं।
- जेडीयू को 23 सीटें,
- कांग्रेस को 8,
- माले को 7 सीटें मिली थीं।
इस बार के पहले चरण में भी यही क्षेत्र फिर निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
This time the Equations have Completely Changed - (इस बार के समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं)
2020 की तुलना में इस बार के चुनाव में कई नए गठजोड़ बने हैं –
- चिराग पासवान की एलजेपी (रामविलास) और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएम अब एनडीए के साथ हैं।
- वहीं मुकेश सहनी की वीआईपी पार्टी महागठबंधन में शामिल है।
- एआईएमआईएम और जन सुराज पार्टी जैसी पार्टियां भी मैदान में हैं, जो वोट शेयर में असर डाल सकती हैं।
पहले चरण में:
- आरजेडी 72 सीटों पर,
- कांग्रेस 24 सीटों पर,
- सीपीआई-माले 14 सीटों पर,
- वीआईपी और सीपीआई 6-6 सीटों पर,
- सीपीएम 3 सीटों पर,
- और आईआईपी 2 सीटों पर चुनाव लड़ रही है।
वहीं, जेडीयू 57 सीटों, बीजेपी 48 सीटों और एलजेपी (रामविलास) 13 सीटों पर मैदान में है।
1314 Candidates Contesting 121 Seats, with the fate of many big names at stake - (121 सीटों पर 1314 उम्मीदवार, कई दिग्गजों की किस्मत दांव पर)
पहले चरण में कई बड़े नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर है।
इनमें जेडीयू, बीजेपी, आरजेडी और कांग्रेस – सभी के मंत्री, पूर्व मंत्री और विधायक शामिल हैं।
नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव, विजय कुमार सिन्हा, सम्राट चौधरी, मंगल पांडे जैसे नेताओं की सीटें इसी फेज में आती हैं।
इनमें जेडीयू, बीजेपी, आरजेडी और कांग्रेस – सभी के मंत्री, पूर्व मंत्री और विधायक शामिल हैं।
नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव, विजय कुमार सिन्हा, सम्राट चौधरी, मंगल पांडे जैसे नेताओं की सीटें इसी फेज में आती हैं।
Challenge for Nitish Kumar - (नीतीश कुमार के लिए चुनौती)
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है।
बीते दो दशकों में वे बिहार की राजनीति का सबसे स्थायी चेहरा रहे हैं।
लेकिन इस बार की 8% बढ़ी वोटिंग को लेकर एनडीए के भीतर भी हलचल है।
बीते दो दशकों में वे बिहार की राजनीति का सबसे स्थायी चेहरा रहे हैं।
लेकिन इस बार की 8% बढ़ी वोटिंग को लेकर एनडीए के भीतर भी हलचल है।
2020 में नीतीश की जेडीयू ने 43 सीटें जीती थीं, जिनमें से 23 विधायक पहले चरण की सीटों से थे।
अगर इस बार इन क्षेत्रों में प्रदर्शन कमजोर रहता है, तो नीतीश की कुर्सी खतरे में पड़ सकती है।
अगर इस बार इन क्षेत्रों में प्रदर्शन कमजोर रहता है, तो नीतीश की कुर्सी खतरे में पड़ सकती है।
Big Opportunity for Tejashwi Yadav - (तेजस्वी यादव के लिए बड़ा मौका)
महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव के लिए यह चुनाव निर्णायक है।
वह खुद राघोपुर से मैदान में हैं और तीसरी बार जीत की कोशिश में हैं।
पिछले चुनाव में उनकी पार्टी आरजेडी को इन इलाकों में बढ़त मिली थी, जिसने उन्हें मुख्य विपक्षी दल बनाया।
वह खुद राघोपुर से मैदान में हैं और तीसरी बार जीत की कोशिश में हैं।
पिछले चुनाव में उनकी पार्टी आरजेडी को इन इलाकों में बढ़त मिली थी, जिसने उन्हें मुख्य विपक्षी दल बनाया।
अब अगर तेजस्वी इस बढ़े मतदान को युवा वोटरों और एंटी-इंकम्बेंसी लहर के रूप में भुना पाते हैं, तो महागठबंधन की राह आसान हो सकती है।
Will 8% Increased Voting change the Government? - (क्या 8% बढ़ी वोटिंग सत्ता पलट देगी?)
इतिहास कहता है –
- 1967, 1980, 1990 - जब-जब 5% से ज्यादा वोटिंग बढ़ी, सरकार बदली।
- इस बार 8.5% का उछाल है।
लेकिन यह भी सच है कि हर बार वोटिंग बढ़ने का मतलब सत्ता परिवर्तन नहीं होता।
कई बार लोग ज्यादा संख्या में वर्तमान सरकार के समर्थन में भी वोट डालते हैं।
इसलिए यह तय करना अभी जल्दबाजी होगी कि बढ़ा हुआ मतदान किसके पक्ष में जाएगा।
कई बार लोग ज्यादा संख्या में वर्तमान सरकार के समर्थन में भी वोट डालते हैं।
इसलिए यह तय करना अभी जल्दबाजी होगी कि बढ़ा हुआ मतदान किसके पक्ष में जाएगा।
Conclusion - (निष्कर्ष)
बिहार चुनाव 2025 का पहला चरण कई मायनों में ऐतिहासिक रहा।
इतिहास की सबसे अधिक 64.69% वोटिंग, 1314 उम्मीदवार, 18 जिलों में 121 सीटें – यह सब बताता है कि बिहार की जनता इस बार निर्णायक बदलाव के मूड में है।
इतिहास की सबसे अधिक 64.69% वोटिंग, 1314 उम्मीदवार, 18 जिलों में 121 सीटें – यह सब बताता है कि बिहार की जनता इस बार निर्णायक बदलाव के मूड में है।
अब सवाल यही है कि क्या यह बढ़ी हुई वोटिंग नीतीश कुमार की सत्ता को चुनौती देगी या तेजस्वी यादव के लिए अवसर बनेगी?
6 नवंबर की यह वोटिंग न सिर्फ पहले चरण का नतीजा तय करेगी, बल्कि बिहार की अगली सरकार की दिशा भी।








